अशोक श्रीवास्तव
चित्रकूट जिला के भदेहदू ग्राम पंचायत के निवासी आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीने को मजबूर हैं। इस पंचायत के जमौली, सुखाऊरा, और गजाधर का डेरा जैसे क्षेत्रों में 50% से अधिक लोग आज भी खुले में शौच के लिए मजबूर हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण योजना का लाभ अभी तक इन लोगों तक नहीं पहुंच पाया है?
प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं भी इन गांवों में केवल 50% लोगों तक ही पहुंच पाई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यहाँ 10% विकलांग और 20% विधवाओं के होते हुए भी उन्हें शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। यही नहीं, वृद्ध पेंशन, विधवा पेंशन और विकलांग पेंशन जैसी सरकारी योजनाएं भी कागज़ों में ही सिमट कर रह गई हैं। भदेहदू ग्राम पंचायत के आधे से अधिक ग्रामीण इन योजनाओं से वंचित हैं।
ग्रामवासियों का गुस्सा अब इस हद तक बढ़ गया है कि वे जिला पंचायत, विधायक और सांसद तक को गाली-गलौज कर अपने गांव से भगाने की धमकी दे रहे हैं। उनका कहना है कि अगर जल्द ही उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर आने वाले राज्यसभा चुनावों में पड़ेगा। गांव के लोगों ने यह साफ कर दिया है कि अगर उन्हें उनका हक नहीं मिला, तो वे राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों के खिलाफ आक्रोश जताने में पीछे नहीं हटेंगे।
सभी राजनीतिक दलों और संगठनों से निवेदन किया जा रहा है कि वे इस संकटग्रस्त क्षेत्र में जाएं और ग्रामीणों की समस्याएं सुनें। केवल चुनाव के समय वोट मांगने के बजाय, जरूरत है कि ज़मीन पर वास्तविक विकास हो।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब योजनाएं कागज़ों में पूरी दिख रही हैं, तो असल में इनका लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा? ग्राम प्रधान, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता कहीं न कहीं पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करती है।