"प्रवेश"
इतिहास में काले युग की तरह याद किए जाने वाले इमरजेंसी काल में नई सोच की पहचान बन कर जन्म लिया इंडिया टुडे ने जिसने न सिर्फ़ इमरजेंसी की बेड़ियाँ तोड़ी बल्कि आज तक बना हुआ है करोड़ों दिलों की धड़कन ।
देश में इमरजेंसी के दौरान हुए दमन के चक्र के दौरान जनता की आवाज़ और इनक़लाबी सोच के जनक अखबारो को दबाने की कोशिश भले ही चलती रही लेकिन उसी दौरान नई सोच के अखबारों ने देश में न सिर्फ़ जन्म लिया बल्कि अपना सिक्का जमाया ।इमर्जन्सी के घाव भले ही वक़्त के साथ भर गये हो लेकिन उस वक़्त जब लोगो के पास मनोरंजन और देश दुनिया की खबरें जानने के लिए रेडियो और अख़बार एक मात्र संचार साधन था तब ये दोनों की इमरजेंसी की ज़द में थे ।
उसी दौरान कई अख़बारों ने जानकारी की अलख जगा कर शब्दों की क्रांति को काग़ज़ पर उकेर कर अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा लिया ।इमरजेंसी के दौरान अपने विचारों को स्वच्छंदता से लिखना और बिना रोक टोक सच जैसा है वैसा ही लिखना अंग्रेजों की ग़ुलामी में जकड़े भारत में आज़ादी की बात करने जैसा था ।विद्या विकास पुरी ने 1975 में इंडिया टुडे मैगज़ीन की नींव रखी जिस वक़्थ पूरे देश में इमरजेंसी की बंदिशें हर एक आम और ख़ास के साथ साथ संचार माध्यमों पर सेंसर बोर्ड की बंदिश थी लिहाज़ा सेंसर शिप के नाम पर देश के आज़ाद ख़यालों पर रोक लगाना था ।हालाँकि की उस वक़्त देश में चल रहे हालातों के बारे में विदेश में बैठे भारतीयों को देश की दशा और दिशा से अवगत कराना देश के संचार माध्यमों की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी थी ।
विद्याविलास पुरी द्वारा शुरू की गई मैगज़ीन 1975 में द्वि-साप्ताहिक पत्रिका इंडिया टुडे जिसके साथ आरून पुरी ने एक प्रकाशक के रूप में अपना कैरियर शुरू किया था। यह पत्रिका आपातकाल के दौरान शुरू हुई थी और इसका उद्देश्य विदेश में रहने वाले भारतीयों के बीच जानकारी के अंतर को भरना था। आज यह भारत की सबसे व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली पत्रिका है, जिसकी पाठक संख्या 11 मिलियन से अधिक है।इमरजेंसी के दौरान अपने विचारों को शब्दों में पिरो कर जनता की आवाज़ बनना यू तो हर किसी खबर नवाज़ की ज़िम्मेदारी थी ।
लेकिन उस वक़्थ सेंसर बोर्ड के आगे कई सारे अख़बारों की सोच ने दम तोड़ दिया इंडिया टुडे उन चंद ख़बरनवाज़ो में से है जिन्होंने देश की आर्थिक वैचारिक परिस्थियाँ के बारे में अपनी आवाज़ देश में ही नहीं देश से सैकडो किलोमीटर दूर विदेश में बैठे भारतीयों तक भी पहुँचाई ।जो इमरजेंसी के हालात के दौरान देश के बारे में जानने को आतुर थे ।अरुण पुरी जो पेशे से चार्टेड अकाउंटेंट थे उनके पिता की इमरजेंसी में जलाई हुई चिंगारी आज मशाल बन कर करोड़ों भारतीयों की आवाज़ बन गई है |