Mahakumbh snan photos 2025: प्रयागराज में महाकुंभ आयोजन का पहला अमृत स्नान आज मंगलवार को मकर संक्रांति को हो रहा है। संगम पर डुबकी के लिए कड़ाके की ठंड की चिंता किए बिना लाखों-करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कुंभ मेला क्षेत्र भव्य सजावट और भव्य तैयारियों से जगमगा उठा है। पूरा माहौल आध्यात्मिकता के प्रकाश से गूंज उठा है। नागा साधुओं ने स्नान शुरू कर दिया है। अखाड़ों का अमृत स्नान करीब साढ़े 9 घंटे तक चलेगा।
जयघोष के साथ आस्था की डुबकी
साधु-संतों का यह अमृत स्नान श्रद्धालुओं के लिये अविस्मरणीय है। साधु-संतों के स्वागत में श्रद्धालुजन अत्यंत उत्साहित हैं। हर-हर महादेव और हर-हर गंगे का जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था। महाकुम्भ में अमृत स्नान सबसे बड़ा पर्व है। अमृत स्नान प्राचीन परंपराओं और संस्कृति के साथ ही भारत की आध्यात्मिकता और आस्था का प्रतीक है। संन्यासियों के दल पहले अमृत स्नान के लिये त्रिवेणी की ओर चल पड़े हैं। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, युवाओं से लेकर महिलाओं और विदेशी श्रद्धालुओं तक ने संगम के तट पर आस्था की डुबकी लगाई। महादेव की जयघोष गूंजती रही।
पेशवा के सामने बाबा रामचंद्र दास की अर्जी
प्रोफेसर और इतिहासकार हेरंब चतुर्वेदी के मुताबिक इस लड़ाई और खून खराबा को रोकने के लिए चित्रकूट के बाबा रामचंद्र दास ने नासिक कुंभ के दौरान अर्जी लगाई. ये अर्जी पेशवा की अदालत तक पहुंची. 1801 में पेशवा ने इस पर फैसला देते हुए महास्नान को शाही स्नान का नाम दिया और उनके कुभ प्रवेश को पेशवाई कहा. न्यूज 18 से एक बातचीत में उन्होंने बताया कि उस दौर के पेशवा ने ये भी तय कर दिया कि अखाड़े इस तरह से क्रम से स्नान के लिए जाएंगे कि जो नासिक में सबसे आगे गया हो, वो अगली जगह लगने वाले कुंभ में पीछे हो जाएगा. जबकि नासिक में पीछे रहने वाला अखाड़ा फिर आगे रहेगा. देशभर में चार स्थानों पर कुंभ लगते हैं. इस तरह से चक्रानुक्रम से सभी अखाड़े आगे पीछे चलेंगे, जिससे संघर्ष न हो.
बाद में अखाड़ा परिषद ने इस तरह के संघर्ष को रोकने का काम किया. उसी की व्यवस्था के अनुसार अब भी अखाड़े आगे और पीछे चलते हैं. बाद में इसमें सुधार कर सभी अखाड़ों के लिए अलग अलग समय और स्नान करने की मियाद भी तय की गई. फिर भी किसी तरह का कोई विवाद हो जाने की स्थिति में परिषद ही फैसला देती है. इसे सभी को मानना पड़ता है. अखाड़ा परिषद अपना शेड्यूल प्रशासन को सौंप देता है. प्रशासन उसी के मुताबिक व्यवस्था करता है.
स्नान के लिए चल रहे दल में सबसे आगे अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का रथ होता है. उनके पीछे महामंडलेश्वर, श्री महंत, महंत, कोतवाल और थानापति वगैरह अखाड़ों के दूसरे ओहदेदार अपने रैंक और स्थिति के मुताबिक क्रम से चलते हैं. प्रशासन पहले से ही इस जुलूस का मार्ग तय किए रहता है. मार्ग के दोनो ओर बैरिकेड्स के बाहर खड़े होकर श्रद्धालु संतों की चरण धूलि माथे से लगाते हैं.