रिपोर्ट, अश्विनी श्रीवास्तव
भरतकूप,(चित्रकूट)। कानून के रखवाले ही अगर अन्याय करने लगें, तो आम जनता कहां न्याय की उम्मीद करे? बैहार गांव के प्रमोद सबिता के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जब उनकी चोरी हुई भैंस की रिपोर्ट दर्ज कराने पर उल्टा उन्हें को ही परेशान किया गया। पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने वाला यह मामला अब सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है, जहां प्रमोद का आरोप है कि पुलिस ने चोरों को पकड़ने के बावजूद लेन-देन कर मामला रफा-दफा कर दिया। जिसका वीडियो सोसल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
9 सितंबर की रात, तीन बजे जब सभी सो रहे थे, प्रमोद सबिता की भैंस चोरों द्वारा उठा ली गई। प्रमोद ने तुरंत थाने जाकर रिपोर्ट दर्ज कराई, यहां तक कि चोरों की पिकअप गाड़ी का नंबर भी पुलिस को सौंप दिया गया। पुलिस ने चोरों को पिकअप गाड़ी के साथ पकड़ तो लिया, लेकिन प्रमोद की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं।
जब प्रमोद ने दरोगा से अपनी भैंस के बारे में पूछा, तो उन्हें बताया गया कि उनकी भैंस सिरसउना गांव में बंधी हुई है। भैंस की सुरक्षित वापसी की बात सुनकर प्रमोद को थोड़ी राहत मिली, लेकिन यह राहत क्षणिक थी। दरोगा ने चोरी की घटना के चौथे दिन रात के 12 बजे किसी आदमी के साथ प्रमोद की भैंस को गांव में लाकर बांध दिया। इसके बाद प्रमोद को थाने बुलाकर एक सादे कागज पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया।
थाने में प्रमोद को गांव के प्रधान के सामने लाया गया और उनसे सादे कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा गया। जब प्रमोद ने दस्तखत करने से मना किया, तो प्रधान और पुलिस ने दबाव डालकर उन्हें दस्तखत करने पर मजबूर कर दिया। प्रमोद का कहना है कि उन्हें बार-बार यही कहा गया कि "तुम्हारी भैंस तो मिल गई है, अब तुम कोट, कचहरी के चक्कर मत काटो। अगर पैसे चाहिए, तो हमसे ले लो।"
वही जब इस मामले में थाना प्रभारी भरतकूप प्रवीण सिंह से बात की गई तो वो गोल मोल बात कर घुमाने लगे और पीड़ित से लाइन में लेकर बात करने को कहने लगे ।जबकि पीड़ित प्रमोद सबिता पहले ही अपनी आप बीती बता चुका था।
यह मामला पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब भैंस और चोर दोनों पकड़े गए थे, तो प्रमोद को न्याय मिलने की बजाय उल्टा उनसे सादे कागज पर दस्तखत करवाना कहां तक उचित है? क्या पुलिस ने चोरों से मिलकर प्रमोद के साथ छल किया? यह सवाल अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।
प्रमोद अब न्याय की आस में दर-दर भटक रहे हैं। पुलिस की इस ढीली कार्यवाही और दबाव की नीति ने प्रमोद को न केवल मानसिक तनाव दिया, बल्कि उनकी न्याय की उम्मीदों को भी तोड़ दिया।