March 30, 2025

सूचना आयोग को नहीं है किसी को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार, गुजरात हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया नियम


रयपुर : सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत कोई भी नागरिक सरकारी विभागों से जानकारी मांग सकता है, लेकिन हाल के दिनों में कुछ राज्य सूचना आयोगों द्वारा आवेदकों को ‘दुरुपयोगकर्ता’ करार देकर ब्लैकलिस्ट करने के मामले सामने आए हैं। इस पर कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सूचना आयोग को किसी अपीलकर्ता या शिकायतकर्ता को काली सूची में डालने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

गुजरात हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इस विषय में महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात सूचना आयोग द्वारा कुछ आवेदकों को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। वहीं, कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी सूचना आयोग के इसी प्रकार के आदेश के अमल पर रोक लगा दी है।

सूचना आयोग को किन अधिकारों की मिली है मंजूरी?

हालांकि, सूचना आयोग के पास कुछ शक्तियाँ हैं जिनका उपयोग वह सूचना के अधिकार का दुरुपयोग रोकने के लिए कर सकता है। ये शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

1. अपील को खारिज करना: यदि आयोग को लगता है कि कोई अपील या शिकायत आधारहीन, तुच्छ, मिथ्या, दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने के इरादे से की गई है, तो वह उसे खारिज कर सकता है।

2. जुर्माना लगाना: यदि कोई लोक सूचना अधिकारी (PIO) बिना किसी उचित कारण के समय सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराता, तो आयोग आरटीआई अधिनियम की धारा 20 के तहत प्रतिदिन ₹250 (अधिकतम ₹25,000) तक का जुर्माना लगा सकता है।

3. अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश: यदि कोई सरकारी अधिकारी आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन करता है, तो आयोग उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है।

4. हरजाना (क्षतिपूर्ति) दिलाना: यदि किसी आवेदक को सूचना न मिलने से कोई नुकसान हुआ है, तो सूचना आयोग धारा 19(8)(बी) के तहत पीड़ित व्यक्ति को उचित हर्जाना दिलाने का निर्देश दे सकता है। आरटीआई अधिनियम में हर्जाने की राशि की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।

ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ कानूनी विकल्प उपलब्ध

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई सूचना आयोग किसी आवेदक को ब्लैकलिस्ट करता है, तो वह इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है। अब तक मिले अदालती फैसले स्पष्ट करते हैं कि सूचना आयोगों को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे मामलों में न्यायपालिका ने आवेदकों के अधिकारों की रक्षा की है और आयोगों को संविधान सम्मत कार्य करने की हिदायत दी है।
देशभर के सूचना आयोगों को चाहिए कि वे कानून के दायरे में रहकर ही कार्य करें और आरटीआई अधिनियम की भावना के अनुरूप पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करें।



Related Post

Advertisement

Tranding News

Get In Touch