September 25, 2025

गैर बैंकिंग अधिकारी कांडे अपेक्स के प्रबंध संचालक सहित ओ.एस.डी की दोहरी भूमिका में, मनमर्जी से चला रहे छत्तीसगढ़ सरकार का बैंक

क्या दो केदार मिल कर भी अपेक्स बैंक को डूबने से बचा पायेंगे या भूमि विकास बैंक की तरह ये भी डूब जायेगा ?


पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक)
रायपुर. अपेक्स की कमान भ्रष्ट और गैर जिम्मेदार अधिकारी कमल नारायण कांडे के पास है। वर्तमान में कांडे अपेक्स बैंक के प्रबंध संचालक के साथ छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री केदार कश्यप के ओ.एस.डी. की भूमिका में कार्यरत हैं। अपेक्स बैंक लगातार सहकारी समितियों के वसूली का अड्डा बन गया है। इस बार भी धान खरीदी और किसानों को भुगतान अपेक्स बैंक और उसके सहयोगी बैंकों जिसे हम जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित के नाम से जानते हैं के माध्यम से किया जायेगा। साथ ही हर समिति को भ्रष्ट अधिकारीयों द्वारा तय रकम को उन तक पहुंचना भी होगा।

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खैर इस सब से इतर एक मानवीय मूल्यों और महिला कर्मचारी सहित उसकी अति वृद्ध माता की मार्मिक व्यथा भी है। अपेक्स बैंक के प्रबंध संचालक कांडे ने निलंबित कर्मचारी मिनाक्षी मांझी के जीवननिर्वाह भत्ते के लिए थाना प्रभारी बरमकेला से 5 अगस्त को अभिमत मांगा था। जो आज दिनांक तक मुख्यालय में अप्राप्त है। वहीं निलंबित कर्मचारी मिनाक्षी मांझी अभी रायगढ़ में न्यायिक अभिरक्षा में जेल निरुद्ध है।


विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इसमें सबसे बड़ा दुखद पहलू यह है कि महिला कर्मचारी की अत्यंत बुजुर्ग माता अन्नपूर्णा मांझी रायपुर से रायगढ़ और सारंगढ़ में न्याय के लिए आर्थिक अभाव में ठोकरें खा रही है। क्योंकि निलंबित कर्मचारी मिनाक्षी मांझी को अभी तक जीवन निर्वाह भत्ता नहीं मिल रहा है। इस मामले में तात्कालिक लेखाधिकारी मीनाक्षी मांझी जो घोटाले के वक्त अवकाश में थी उसे भी सह आरोपी बनाया गया था, जबकि बैंक द्वारा की गई प्रारम्भिक जांच में उसे निर्दोष बताया गया है।

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राज्य के सबसे बड़े बैंक और मंत्री केदार कश्यप के ओ.एस.डी. के रूप में थाना प्रभारी बरमकेला से अभिमत की मांग प्रशासनिक अराजकता और प्रबंधन की गैर जानकारी का सबसे बड़ा उदाहरण है। क्योंकि शासन स्तर में पत्राचार वरिष्ठ अधिकारियों से किया जाता है ना की कनिष्ठ कर्मचारियों से। यदि प्रबंध संचालक को अभिमत की आवश्यकता थी तब उन्हें जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और विधिक सेवा के लोक अभियोजक अधिकारियों से लेना था ना कि विवेचकों से।

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छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966 के नियम 53 में जीवन भत्ते के भुगतान का प्रावधान है। सेवा नियम, 1966 के अनुसार, जेल में बंद कर्मचारियों को जीवन भत्ते (subsistence allowance) का भुगतान किया जाता है, जब तक कि उन्हें सेवा से बर्खास्त या हटाया नहीं जाता। यह भत्ता निलंबन अवधि के दौरान दिया जाता है, और इसकी मात्रा मूल वेतन का 50% होती है, जो पहले 6 महीनों के लिए दी जाती है, और उसके बाद 75%. हो जाता है। यदि किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त या हटा दिया जाता है, तो जीवन भत्ता बंद कर दिया जाता है।

कुछ वरिष्ठ अधिकारी-कर्मचारियों ने नाम नहीं छापने की शर्त में स्पष्ट बताया कि प्रबंध संचालक के गैर बैंकिंग पृष्ठभूमि की वजह से बैंक वित्तीय कुप्रबंधन का शिकार हो गया है। 2018 में कांग्रेस ने सत्ता संभालते ही 8 हजार करोड़ से ज्यादा की राशि का किसानों का ऋण माफ़ कर दिया था और शासन से राशि की क्षतिपूर्ति भी की थी। पंरतु छः - सात सालों में ही बैंक के इन-बैलैंसस की राशि सैकड़ों करोड़ में फिर से पहुंच गई है। इसके लिए बैंक का उच्चतर प्रबंधन जिम्मेदार है।

इन सभी संदर्भ में बैंक के प्रबंधक संचालक के.एन.कांडे. से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने हमसे बात करने से इंकार कर दिया। वहीं थाना प्रभारी बरमकेला ए बेक से संपर्क किया गया तो उन्होंने अभिमत के पत्र की जानकारी से स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि इस संबंध में कोई भी पत्र आज दिनांक तक उन्हें अप्राप्त है। अब देखने वाली बात यह है कि एक बुजुर्ग महिला अपनी पुत्री के लिए आर्थिक अभाव में कब तक न्याय की लड़ाई को जारी रख पाती है या शायद ईश्वर की चौखट पे खड़े रह कर न्याय को जीतते देखतीं हैं?



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